ज़िन्दगी और मौत के बीच की वो जगह ...
जैसे जन्नत और दोज़ख के बीच
वो बीस कदम का फ़ासला
जैसे धूप के माथे पे उभरता , बड़ा होता
अँधेरे का टीका
जैसे आसमान में फंसी
जड़ , उड़ ना पाती चिड़िया
जैसे 300 सालों से
सूखे पत्तों , टूटी टहनियों का बोझ ढोता
बरगद का पेड़
जैसे आसमान और धरती के बीच ही कहीं
गुमशुदा बारिश की बूँदें
जैसे चेहरे की झुर्रियों में फंसी सी
जवानी की बातें
जैसे होठों पर ही कतार बनातीं
अन्दर ना जा पाती सांसें
जैसे रुंधे गले में अटकी
दम तोड़ती आवाज़
जैसे पलकों के छोर से
ना गिरते, न ठहरते , फाँसी लगाते आँसूं
जैसे शब्दों की गुफ़ा में कैद
कितने ही जज़्बात
जैसे कभी ना ख़त्म होता सा
घड़ी का एक से दूसरे पल तलक सफ़र
जैसे ना अधूरी
ना पूरी
कहीं बीच में ही
झुँझलाती सकपकाती-सी
मेरी कविता ..
जैसे जन्नत और दोज़ख के बीच
वो बीस कदम का फ़ासला
जैसे धूप के माथे पे उभरता , बड़ा होता
अँधेरे का टीका
जैसे आसमान में फंसी
जड़ , उड़ ना पाती चिड़िया
जैसे 300 सालों से
सूखे पत्तों , टूटी टहनियों का बोझ ढोता
बरगद का पेड़
जैसे आसमान और धरती के बीच ही कहीं
गुमशुदा बारिश की बूँदें
जैसे चेहरे की झुर्रियों में फंसी सी
जवानी की बातें
जैसे होठों पर ही कतार बनातीं
अन्दर ना जा पाती सांसें
जैसे रुंधे गले में अटकी
दम तोड़ती आवाज़
जैसे पलकों के छोर से
ना गिरते, न ठहरते , फाँसी लगाते आँसूं
जैसे शब्दों की गुफ़ा में कैद
कितने ही जज़्बात
जैसे कभी ना ख़त्म होता सा
घड़ी का एक से दूसरे पल तलक सफ़र
जैसे ना अधूरी
ना पूरी
कहीं बीच में ही
झुँझलाती सकपकाती-सी
मेरी कविता ..