Tuesday, 23 October 2012

Zindagi aur maut ke beech ki woh jagah..

ज़िन्दगी और मौत के बीच की वो जगह ...


जैसे जन्नत और दोज़ख के बीच
वो बीस कदम का फ़ासला

जैसे धूप के माथे पे उभरता , बड़ा होता
अँधेरे का टीका

जैसे आसमान में फंसी
जड़ , उड़ ना पाती चिड़िया

जैसे 300 सालों से
सूखे पत्तों , टूटी टहनियों का  बोझ ढोता
बरगद का पेड़

जैसे आसमान और धरती के बीच ही कहीं
गुमशुदा बारिश की बूँदें

जैसे चेहरे की झुर्रियों में फंसी सी
जवानी की बातें

जैसे होठों पर ही कतार बनातीं
अन्दर ना जा पाती सांसें

जैसे रुंधे गले में अटकी
दम तोड़ती आवाज़

जैसे पलकों के छोर से
ना गिरते, न ठहरते , फाँसी लगाते आँसूं

जैसे शब्दों की गुफ़ा में कैद
कितने ही जज़्बात

जैसे कभी ना ख़त्म होता सा
घड़ी का एक से दूसरे पल तलक सफ़र

जैसे ना अधूरी
ना पूरी
कहीं बीच में ही
झुँझलाती  सकपकाती-सी
मेरी कविता ..

I shall remain..

Long after
sunlight leaves the canvas of the sky
I shall remain
as the last orange splatter
on the aridity of black..
then descend
onto the canvas of your life
and douche its hues
in my beauteous colors..

You'll look at me
with suspicion and wonder
I'll hold you to my bosom
and let you soak
in the elixir of my soul..

Together
we shall walk unto eternity!

Your breath..

It sang to me..
your breath sang to me
beautiful sonnets of yore
and delighted, I broke into madness
a mad, wild dance.

It kissed my skin..
your breath kissed my skin
and struck, I shattered into pieces
radiant pieces of love;
it whispered to them..
your breath whispered to them
and they ballooned
big balloons of desires..
your breath swelled
and the balloons found their space
their wonderful little space in the swell.

It came like a tide
your breath came like a tide
my soul was awash
my existence was awash
and I rode,
I rode atop the tide
into the forever seas of euphoria..

Tuesday, 14 August 2012

Aaj bhi main....

आज भी मैं
उन लम्हों में फंसी हूँ...

रेस्तरां जाती हूँ
तो कॉफ़ी में घुले हुए तुम्हारे शब्द
अपनी परत बना लेते हैं
मेरे होठों पर  - मैं कुछ कह नहीं पाती
और अन्दर ही अन्दर
जकड़ती जाती हूँ
जकड़ती जाती हूँ ....

टैक्सी में बैठती हूँ
तो सीट पर बिखरे
तुम्हारी साँसों के टुकड़े
मेरी उँगलियों पर चढ़ कर
मुझ पर बदहवास रेंगने लगते हैं
मैं हिल नहीं पाती
और
सिकुड़ती जाती हूँ
सिकुड़ती जाती हूँ ....

सब्जी काटती हूँ
तो मेरे हाथों की रेखाओं से टंगी
तुम्हारे स्पर्श की बूँदें
बहने लगती हैं
किचन में पानी पानी हो जाता है
मैं रोक नहीं पाती
और
डूबती जाती हूँ
डूबती जाती हूँ ....

हरा कुर्ता पहनती हूँ
तो तुम्हारे अहसास में लिपटी उसकी सीवन
मेरे फेफड़ों को बाँध देती है
मैं साँस  नहीं ले पाती
और
हाँफती जाती हूँ
हाँफती जाती हूँ ....

आज भी मैं
जाने कब तक मैं
उन लम्हों में फंसी हूँ.......!

Friday, 23 March 2012

The Alchemy of Love - my newest composition


The frost of your heartbeat
the ice in your breath
the winter in your eyes
and there,
a flash of sepia memories..
the warm odor of love..
a snug whisper of nostalgia..
and I behold

as the sky stretch between us 
contracts into intimate perimeters of long-lost love..
as the silence of 
heat in our hearts
talks to my cold shadows..
and the alchemy of love
the beautiful alchemy of love
plants a passionate kiss of warmth
- the shadows are now
feisty sunlit impressions
on the Siberian expanse
of sands of time.

Sunday, 18 March 2012

Kuchh nagme bhoole bisre se...

1.  यूँ ही , एक मर्तबा , नाकामयाबी के जश्न में,
पैमाना बोल उठा  - यह कैसी रिवायत है,
हम बोले - उम्मीद पे हर शख्स कायम है
एक शाम है, जो खाली पैमाने के भी नाम है.

2. ...और फिर शुरू हुआ
मुलाकातों का सिलसिला
हम अक्सर मिलते रहे,
और सिमटता चला गया बीच में
फासलों का काफिला.


3.  क्यूँ हो नहीं जाती
काफिले-ए-ख्यालात में तेरी शख्सियत यूँ गुम
...फुर्सत से भी सोचें
तो तेरा नाम-ओ-निशाँ तक ढूंढ ना पाएं


4.  मेरी ज़िन्दगी के हर पहलु में
इस कदर सिमट गए हो तुम,
ज़िन्दगी ज़िन्दगी नहीं
तुम्हारी मौजूदगी का महज़ सुबूत लगती है


5.  रौनक-ए-जहाँ तुम
मेरी ज़िन्दगी का दिया बुझाकर
चल दिए थे...
अब लौ बन ना रौशन होकर लौटो
...अँधेरा जल उठेगा.


6.  मेरी तकदीर के वज़ीर ने जब लिखी तकदीर
खुद की शहंशाह मैं बन गयी फकीर
पढ़ दिया तुमने फरमान उस इश्क़ का
कहते हैं जिसे जन्नत, पर जो है महज़ ज़ंजीर.



7.  इक धुप का टुकड़ा यूँ आया, क्या आया
यादों का अंधेर साम्राज्य रौशन हो गया
चाह था उसे अपनी अंजुरी में समेट लूँ
वो ज़िद्द कर मेरी सम्पूर्ण काया पर छा गया
बोली मैं, "क्यूँ आये हो, मैं अँधेरे की आदी हूँ"
वो बोला, "मैं तेरे अंतर्मन की रौशनी से खिंचता आया हूँ"
....और जाने क्या बात थी उसकी बदसूरत रौशनी में
मैंने अपने खूबसूरत अंधियारे को भी छोड़ दिया.


8.  सच में सराबोर ज़िन्दगी जी रही थी
अचानक छू दिया एक मीठे से झूठ ने
....और 50  साल यूँ ही फीके पड़ गए.


9.  पुराने गिले-शिकवे दूर किये
भूल-चूक माफ़ करी
फिर भी डर रही थी
और संकोच था
मीठा-सा संकोच
पर डालें हाथों में हाथ
हम चल पड़े
दोस्ती की पगडण्डी पर..
मीठा सा संकोच
जाने कब
मीठा सा अपनापन बन गया
और हम
एक बार फिर
पक्के दोस्त बन गए
- वो और मैं
मेरी ज़िन्दगी और मैं.


10.  शतरंज की बिस्सत पर भी
क्या शानदार पक्षपात रचता है
सब मोहरों को खो दिया तो क्या ग़म है
गर राजा बच गया ये क्या कम है
पर जो गया राजा तो हैं बाकी सब बेकार
चाहे सजी हों हाथी घोड़ों मंत्रियों की कतार
क्यूंकि बिन राजा तो चखनी पड़ती है हार
अरे, सोच क्या रहे हो
जाओ, ना होने दो राजा पर वार
तभी तो कहते हैं सूत्रधार
हो चाहे कितने ही निहत्थे देशवासियों पर वार
किये जाएँ कितने ही ज़ुल्म बार बार
रहे चाहें छोटे बच्चे, औरतें बीमार
आबाद रहे, फले फूलें हमारे सत्ताधार
अफ़सोस!
यही है कलयुग की कहानी का सार 





Tuesday, 13 March 2012

The Kiss

And, in the afterwards
your kiss came and slept
in the abyss of my soul
it snored, it roared
I could not rest..
it stretched wide and lazy
I shriveled to let it fit..
it hammered the moist leftovers in the wall
I bled and moaned..
it turned violent somersaults
I ached, and succumbed.

I run to you now
for the kiss of release
for the kiss of relief
for the placebo of love...