1. यूँ ही , एक मर्तबा , नाकामयाबी के जश्न में,
पैमाना बोल उठा - यह कैसी रिवायत है,
हम बोले - उम्मीद पे हर शख्स कायम है
एक शाम है, जो खाली पैमाने के भी नाम है.
2. ...और फिर शुरू हुआ
मुलाकातों का सिलसिला
हम अक्सर मिलते रहे,
और सिमटता चला गया बीच में
फासलों का काफिला.
3. क्यूँ हो नहीं जाती
काफिले-ए-ख्यालात में तेरी शख्सियत यूँ गुम
...फुर्सत से भी सोचें
तो तेरा नाम-ओ-निशाँ तक ढूंढ ना पाएं
4. मेरी ज़िन्दगी के हर पहलु में
इस कदर सिमट गए हो तुम,
ज़िन्दगी ज़िन्दगी नहीं
तुम्हारी मौजूदगी का महज़ सुबूत लगती है
5. रौनक-ए-जहाँ तुम
मेरी ज़िन्दगी का दिया बुझाकर
चल दिए थे...
अब लौ बन ना रौशन होकर लौटो
...अँधेरा जल उठेगा.
6. मेरी तकदीर के वज़ीर ने जब लिखी तकदीर
खुद की शहंशाह मैं बन गयी फकीर
पढ़ दिया तुमने फरमान उस इश्क़ का
कहते हैं जिसे जन्नत, पर जो है महज़ ज़ंजीर.
7. इक धुप का टुकड़ा यूँ आया, क्या आया
यादों का अंधेर साम्राज्य रौशन हो गया
चाह था उसे अपनी अंजुरी में समेट लूँ
वो ज़िद्द कर मेरी सम्पूर्ण काया पर छा गया
बोली मैं, "क्यूँ आये हो, मैं अँधेरे की आदी हूँ"
वो बोला, "मैं तेरे अंतर्मन की रौशनी से खिंचता आया हूँ"
....और जाने क्या बात थी उसकी बदसूरत रौशनी में
मैंने अपने खूबसूरत अंधियारे को भी छोड़ दिया.
8. सच में सराबोर ज़िन्दगी जी रही थी
अचानक छू दिया एक मीठे से झूठ ने
....और 50 साल यूँ ही फीके पड़ गए.
9. पुराने गिले-शिकवे दूर किये
भूल-चूक माफ़ करी
फिर भी डर रही थी
और संकोच था
मीठा-सा संकोच
पर डालें हाथों में हाथ
हम चल पड़े
दोस्ती की पगडण्डी पर..
मीठा सा संकोच
जाने कब
मीठा सा अपनापन बन गया
और हम
एक बार फिर
पक्के दोस्त बन गए
- वो और मैं
मेरी ज़िन्दगी और मैं.
10. शतरंज की बिस्सत पर भी
क्या शानदार पक्षपात रचता है
सब मोहरों को खो दिया तो क्या ग़म है
गर राजा बच गया ये क्या कम है
पर जो गया राजा तो हैं बाकी सब बेकार
चाहे सजी हों हाथी घोड़ों मंत्रियों की कतार
क्यूंकि बिन राजा तो चखनी पड़ती है हार
अरे, सोच क्या रहे हो
जाओ, ना होने दो राजा पर वार
तभी तो कहते हैं सूत्रधार
हो चाहे कितने ही निहत्थे देशवासियों पर वार
किये जाएँ कितने ही ज़ुल्म बार बार
रहे चाहें छोटे बच्चे, औरतें बीमार
आबाद रहे, फले फूलें हमारे सत्ताधार
अफ़सोस!
यही है कलयुग की कहानी का सार
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