आज भी मैं
उन लम्हों में फंसी हूँ...
रेस्तरां जाती हूँ
तो कॉफ़ी में घुले हुए तुम्हारे शब्द
अपनी परत बना लेते हैं
मेरे होठों पर - मैं कुछ कह नहीं पाती
और अन्दर ही अन्दर
जकड़ती जाती हूँ
जकड़ती जाती हूँ ....
टैक्सी में बैठती हूँ
तो सीट पर बिखरे
तुम्हारी साँसों के टुकड़े
मेरी उँगलियों पर चढ़ कर
मुझ पर बदहवास रेंगने लगते हैं
मैं हिल नहीं पाती
और
सिकुड़ती जाती हूँ
सिकुड़ती जाती हूँ ....
सब्जी काटती हूँ
तो मेरे हाथों की रेखाओं से टंगी
तुम्हारे स्पर्श की बूँदें
बहने लगती हैं
किचन में पानी पानी हो जाता है
मैं रोक नहीं पाती
और
डूबती जाती हूँ
डूबती जाती हूँ ....
हरा कुर्ता पहनती हूँ
तो तुम्हारे अहसास में लिपटी उसकी सीवन
मेरे फेफड़ों को बाँध देती है
मैं साँस नहीं ले पाती
और
हाँफती जाती हूँ
हाँफती जाती हूँ ....
आज भी मैं
जाने कब तक मैं
उन लम्हों में फंसी हूँ.......!
उन लम्हों में फंसी हूँ...
रेस्तरां जाती हूँ
तो कॉफ़ी में घुले हुए तुम्हारे शब्द
अपनी परत बना लेते हैं
मेरे होठों पर - मैं कुछ कह नहीं पाती
और अन्दर ही अन्दर
जकड़ती जाती हूँ
जकड़ती जाती हूँ ....
टैक्सी में बैठती हूँ
तो सीट पर बिखरे
तुम्हारी साँसों के टुकड़े
मेरी उँगलियों पर चढ़ कर
मुझ पर बदहवास रेंगने लगते हैं
मैं हिल नहीं पाती
और
सिकुड़ती जाती हूँ
सिकुड़ती जाती हूँ ....
सब्जी काटती हूँ
तो मेरे हाथों की रेखाओं से टंगी
तुम्हारे स्पर्श की बूँदें
बहने लगती हैं
किचन में पानी पानी हो जाता है
मैं रोक नहीं पाती
और
डूबती जाती हूँ
डूबती जाती हूँ ....
हरा कुर्ता पहनती हूँ
तो तुम्हारे अहसास में लिपटी उसकी सीवन
मेरे फेफड़ों को बाँध देती है
मैं साँस नहीं ले पाती
और
हाँफती जाती हूँ
हाँफती जाती हूँ ....
आज भी मैं
जाने कब तक मैं
उन लम्हों में फंसी हूँ.......!
Loved the imagery but was bothered by repeat stanzas ...they broke the rhythm...also the weds are rough in those stanzas than the rest of the poem
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