Saturday, 10 March 2012

Aansun

भिन्न भिन्न जगह
भिन्न भिन्न परिस्त्थितियाँ
और बहते हैं आंसूं !


कभी गिरते हैं कमरे के फर्श पर
नन्हा सरोवर बन जाता है
चींटियाँ आकर नहा जाती हैं
और फिर, बाई के मैले पोछे का हिस्सा बन
मर जाते हैं !


कभी गिरते हैं बाथरूम में
शावर के पानी के साथ, खो देते हैं अपनी पहचान
फिर साबुन के बुलबुलों में घुल
बह जाते हैं नाली में
जा मिलते हैं पूरे शहर की गन्दगी से!


कभी गिरते हैं मैदान में
धरती की छाती पर
वह भी थोड़ा अफ़सोस करती है
दुःख बांटती है
फिर जब सूख जाते हैं ये
तो भूल जाती है,
बूढ़ी हो गयी है न!


कभी गिरते हैं
दोस्त की साटन शर्ट पर
और गहरे रंग का दाग रह जाता है
दोस्त याद रखता है, वह दाग
जब तक शर्ट
धुल नहीं जाता!


और फिर......
कभी गिरते हैं
भीतर के खालीपन में
और भयावह गूँज होती है
होती रहती है
जब तक नए आंसुओं की नयी गूँज
आकर डूबा न दे उसे....


सबसे खतरनाक होता है यह
आंसुओं का बाहर न गिरना!














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