शौक़ीन आसमान..
सुबह ओढ़ता है पीली चुनरी
जिसपर उड़ते पंछी और रंगीन पतंगें
बंधेज के गोलों से लगते हैं
शाम में
सजा लेता है
नीला ओवरकोट
कभी सादा
तो कभी बादलों के सफ़ेद काले प्रिंट के साथ...
जब मैं छत पर जाती हूँ
वह सामने वाले घर की छत की दीवार को छूता
नीले ओवरकोट में
बैठा बुलाता सा दिखता है
जब मैं जूतों के फीते
टेढ़े मेढ़े बाँध
सीढीयों पर हांफती जाती हूँ
उसे पकड़ने
वह अगली छत पर दिखता है
मैं यूँ ही दौड़ती रहती हूँ
वो यूँ ही दौडाता रहता है..
फिर रात होते ही
छुप जाता है
काले लिहाफ के पीछे
शायद ठण्ड से
शायद अपनी माँ के डर से...
जब माँ मुझे थपथपा कर सुलाती है
तो लगता है
मेरी सफ़ेद खिड़की पर
अपना कला लिहाफ ओढ़े
थपथप थपथप
वो भी सोता है.
सुबह ओढ़ता है पीली चुनरी
जिसपर उड़ते पंछी और रंगीन पतंगें
बंधेज के गोलों से लगते हैं
शाम में
सजा लेता है
नीला ओवरकोट
कभी सादा
तो कभी बादलों के सफ़ेद काले प्रिंट के साथ...
जब मैं छत पर जाती हूँ
वह सामने वाले घर की छत की दीवार को छूता
नीले ओवरकोट में
बैठा बुलाता सा दिखता है
जब मैं जूतों के फीते
टेढ़े मेढ़े बाँध
सीढीयों पर हांफती जाती हूँ
उसे पकड़ने
वह अगली छत पर दिखता है
मैं यूँ ही दौड़ती रहती हूँ
वो यूँ ही दौडाता रहता है..
फिर रात होते ही
छुप जाता है
काले लिहाफ के पीछे
शायद ठण्ड से
शायद अपनी माँ के डर से...
जब माँ मुझे थपथपा कर सुलाती है
तो लगता है
मेरी सफ़ेद खिड़की पर
अपना कला लिहाफ ओढ़े
थपथप थपथप
वो भी सोता है.
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