सपनों का सजीला चित्रपट
और मैं उसकी नायिका
पट के इस छोर से उस छोर
एक नामुमकिन ज़िन्दगी नापती...
अचानक हुई खट-खट
यह किसने मुझे जगाया
बदहवास सी , घबराई सी
जब खोला दरवाज़ा
तो देखा
चांदनी की चमकती साड़ी में लिपटी
बादलों से सजी, लोरी गाती
रात खड़ी थी...
टिमटिमाते अंग, पलकों पे सजी ओस की बूँदें
बलखाती हवा के केश लिए
चाँद के आईने में खुद को निहारती थी
सजग, चंचल
सुस्ताते पेड़ों की शाखाओं पर लटक लटक
पत्तों पर फिसलते
सोये हुए झिंगुर के कान में शोर मचाते
मुट्ठी में सूरज को दबोचे
वो आई थी मेरे यहाँ...
पर यह क्या!
धूप के कण
उसकी अँगुलियों से आज़ाद हो
टपकते थे
हर बूँद, मिल मिटटी में
बन प्रकाश पुंज
रात के चेहरे में प्रतिबिंबित होती थी
सौन्दर्य और बढाती थी
सबसे बेखबर
खुद से बेखबर
ख़ामोशी के घुंघरू बांधे, बजाते
वो चलती जाती थी
हर घर, हर गली
मीठी लोरी सुनाती
नींद के आगोश में सबको ले जाती....!
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