Saturday, 10 March 2012

Woh Kamra

बालकनी में
हवा के संग टहलते हुए
यूँ ही वो कमरा दिख जाता है
गगनचुम्बी पेड़ की छाँव में बैठी इमारत
के तीसरे माले का कमरा..




वो कमरा, पेड़ पर चढ़ कर
मुझ तक पहुँच
मेरी धड़कन के साथ तालमेल बैठाता है
और मन गढ़ने लगता है
कहानी उसके सफ़र की......
फिर समय के इस शहर से उस शहर
मैं बढती चलती हूँ
कल्पना का रंग बिरंगा झोला टाँगे......
कमरे की बत्तियों का पीलापन
मेरा साथ देता है,
हर पड़ाव पर
किस्से कहता है ,
फिर, उसके सीने में पिरोई
खुशियाँ, दुःख, आशाएं
मेरी नब्जों में दौड़ने लगती हैं
और उन पलों में
मैं जी लेती हूँ
एक अनजान जीवन....




बत्तियां बंद होते ही
मैं भी आकर सो जाती हूँ.

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